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दिल्ली-NCR में बिगड़ती हवा के बीच GRAP Stage-II लागू: जनरेटर सेट और कोयले के इस्तेमाल पर पाबंदी, एंटी-स्मॉग गन और मैकेनिकल स्वीपिंग तेज

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वायु गुणवत्ता का स्तर बिगड़कर 'बहुत खराब' (Very Poor) श्रेणी में पहुंचने और एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के 300 के पार (324 तक) चले जाने के बाद वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने पूरे दिल्ली-एनसीआर में तत्काल प्रभाव से ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) का दूसरा चरण यानी 'ग्रेप-2' (Stage-II) लागू कर दिया है।

ग्रेप-2 लागू होने के बाद पूरे क्षेत्र में आपातकालीन और आवश्यक सेवाओं को छोड़कर नियमित एवं व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए डीजल जनरेटर (DG) सेट के इस्तेमाल पर सख्त पाबंदी लगा दी गई है। इसके अलावा होटलों, रेस्टोरेंट्स और ढाबों में कोयले व तंदूर के लिए लकड़ी जलाने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। निजी वाहनों की आवाजाही को हतोत्साहित करने के लिए पार्किंग दरों को बढ़ाने तथा मेट्रो और सीएनजी/इलेक्ट्रिक बसों के फेरे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।

प्रशासनिक स्तर पर सड़कों से धूल हटाने के लिए मैकेनिकल और वैक्यूम स्वीपिंग के साथ-साथ मुख्य सड़कों पर एंटी-स्मॉग गन और पानी के छिड़काव को तेज कर दिया गया है। साथ ही, वाहनों के प्रदूषण जांच प्रमाणपत्र (PUCC) की चेकिंग सख्त कर दी गई है और नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों पर जुर्माना लगाने व ईंधन देने से रोकने की कार्रवाई की जा रही है। CAQM ने नागरिकों से सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करने और खुले में कचरा न जलाने की अपील की है।

दिवाली पर दिल्ली-NCR में ग्रीन पटाखों को सुप्रीम कोर्ट की सशर्त मंजूरी: तय की गई टाइम लिमिट, संवेदनशील इलाकों में पाबंदी बरकरार

दिवाली त्योहार से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए केवल 'ग्रीन पटाखे' (Green Crackers) जलाने की सशर्त अनुमति प्रदान की है। शीर्ष अदालत ने 2 नवंबर को सुनवाई के दौरान पर्यावरण सुरक्षा और जन भावनाओं के बीच संतुलन बनाते हुए आतिशबाजी के लिए सख्त समय सीमा और गाइडलाइंस निर्धारित की हैं।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि दिल्ली-एनसीआर में 7 नवंबर और दिवाली के मुख्य दिन 8 नवंबर को केवल तय समय पर ही ग्रीन पटाखे जलाए जा सकेंगे। अदालत के अनुसार, इन दोनों दिनों में केवल सुबह 6 बजे से 7 बजे तक और रात 8 बजे से 10 बजे तक ही आतिशबाजी करने की छूट होगी।

अदालत ने इसके साथ ही सख्त हिदायत दी है कि अस्पतालों, नर्सिंग होम, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, वृद्धाश्रमों और शैक्षणिक संस्थानों के 300 मीटर के दायरे में (साइलेंस जोन) किसी भी तरह के पटाखे जलाने की इजाजत नहीं होगी। इन क्षेत्रों को 'नो-क्रैकर जोन' घोषित करने, उचित साइनबोर्ड लगाने और सार्वजनिक घोषणाओं के माध्यम से नागरिकों को सतर्क करने के निर्देश प्रशासन को दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने प्राधिकारियों से कहा है कि इन नियमों का धरातल पर कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।

संपादकीय: दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की आहट

हर साल नवंबर की शुरुआत के साथ ही राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और आसपास के पूरे एनसीआर क्षेत्र पर घने धुंध और जहरीले स्मॉग की चादर तन जाती है। हवा का स्तर 'गंभीर' श्रेणी में पहुंचते ही आपातकालीन कदम उठाने की परंपरा सी बन गई है। हाल ही में प्रदूषण से निपटने के लिए लागू किए गए कड़े शीतकालीन उपाय जैसे पुराने वाहनों के प्रवेश पर रोक, पार्किंग शुल्क को दोगुना करना और दफ्तरों में 50 प्रतिशत 'वर्क फ्रॉम होम' अनिवार्य करना कागजी तौर पर प्रशासनिक सतर्कता को जरूर दर्शाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह हर साल की वही घिसी-पिटी तात्कालिक कवायद नहीं है?

दिल्ली की आवोहवा खराब होने के पीछे मुख्य रूप से वाहनों का धुआं, निर्माण गतिविधियों से उड़ने वाली धूल और पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं जिम्मेदार मानी जाती हैं। निश्चित रूप से, जब तक आपात स्थिति में निजी वाहनों के उपयोग को हतोत्साहित नहीं किया जाएगा और ट्रैफिक जाम को नियंत्रित नहीं किया जाएगा, तब तक एक्यूआई (AQI) के गिरते स्तर को संभालना मुश्किल है। इस दृष्टि से पार्किंग दरें बढ़ाना और कर्मचारियों को घर से काम करने की इजाजत देना एक सही प्रशासनिक कदम है।

हालांकि, इन नियमों की सफलता केवल इनके ऐलान में नहीं, बल्कि इनके सख्त और पारदर्शी क्रियान्वयन (Execution) में निहित है। अतीत का अनुभव बताता है कि सार्वजनिक परिवहन की कमी और अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी न होने के कारण पार्किंग शुल्क बढ़ाने के बावजूद लोग निजी वाहनों से यात्रा करने को मजबूर रहते हैं। यदि बसों और मेट्रो का पर्याप्त विस्तार न हो, तो केवल दंड और प्रतिबंध लगाकर आम जनता को राहत नहीं दी जा सकती।

हवा की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती; इसलिए दिल्ली में वायु प्रदूषण से लड़ाई केवल दिल्ली सरकार या स्थानीय नगर निगम के बलबूते नहीं जीती जा सकती। इसके लिए केंद्र सरकार, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बीच एक स्थायी और समन्वित तंत्र की आवश्यकता है। सीजनल एक्शन प्लान के बजाय अब साल भर चलने वाले दीर्घकालिक समाधानों की जरूरत है, जिनमें हरित ऊर्जा का विस्तार, सार्वजनिक परिवहन को शत-प्रतिशत इलेक्ट्रिक बनाना और उद्योगों से होने वाले उत्सर्जन पर शून्य-सहनशीलता की नीति अपनाना शामिल है।

सांस लेना हर नागरिक का मूलभूत संवैधानिक अधिकार है। अदालतों की फटकार और आपातकालीन पाबंदियों से आगे बढ़कर अब सरकार और नागरिक समाज दोनों को एक ठोस इच्छाशक्ति का परिचय देना होगा। जब तक नीतिगत निर्णयों को जमीन पर ईमानदारी से लागू नहीं किया जाएगा, तब तक हर साल की यह शीतकालीन पाबंदी महज एक रस्म बनकर रह जाएगी और दिल्ली-एनसीआर की जनता जहरीली हवा में सांस लेने को अभिशप्त रहेगी।

दिल्ली-NCR में प्रदूषण पर लगाम के लिए कड़े शीतकालीन नियम लागू: पुराने वाहनों के प्रवेश पर रोक, दोगुने पार्किंग शुल्क और 50% वर्क फ्रॉम होम के आदेश

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर क्षेत्रों में सर्दियों के मौसम में बढ़ने वाले वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार ने सख्त प्रतिबंधों और उपायों की शुरुआत कर दी है। 1 नवंबर से लागू किए गए इन नए प्रावधानों का मुख्य उद्देश्य वाहनों के धुएं और निर्माण कार्यों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना है।

इन कड़े उपायों के तहत दिल्ली से बाहर पंजीकृत गैर-BS-VI (या बीएस-4 और उससे पुराने) मानक वाले पेट्रोल और डीजल वाहनों के राष्ट्रीय राजधानी में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, हालांकि सीएनजी, इलेक्ट्रिक वाहनों और आपातकालीन सेवाओं को इससे छूट दी गई है। इसके अलावा, ट्रैफिक का दबाव कम करने के लिए सरकारी और निजी कार्यालयों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों के लिए वर्क फ्रॉम होम (घर से काम) की व्यवस्था अनिवार्य की गई है, जबकि आवश्यक और आपातकालीन सेवाओं को इससे अलग रखा गया है।

प्रदूषण नियंत्रण की नीति के तहत भीड़भाड़ वाले इलाकों में निजी वाहनों के उपयोग को हतोत्साहित करने के लिए अधिकृत पार्किंग स्थलों पर शुल्क को दोगुना कर दिया गया है। साथ ही, धूल उड़ने वाले निर्माण और ध्वस्तीकरण (demolition) कार्यों पर भी रोक लगा दी गई है। यातायात को सुचारू बनाने के लिए नगर निगम (MCD) और दिल्ली सरकार के कार्यालयों के समय में भी बदलाव किया गया है, ताकि पीक ऑवर्स में ट्रैफिक जाम से बचा जा सके। प्रशासन द्वारा इन नियमों की निगरानी एएनपीआर (ANPR) कैमरों और एआई-सक्षम कमांड सेंटर के जरिए की जा रही है।