मोहित गौतम (दिल्ली) : प्रत्येक वर्ष 8 अक्टूबर का दिन संपूर्ण राष्ट्र के लिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय वायु सेना के अदम्य साहस, अभेद्य वीरता और अटूट समर्पण को नमन करने का पावन अवसर होता है। वर्ष 1932 में स्थापित भारतीय वायु सेना आज अपने 94वें स्थापना दिवस के ऐतिहासिक पड़ाव पर खड़ी है। "नभः स्पृशं दीप्तम्" अर्थात् 'गर्व के साथ आकाश को छूना' के अमर ध्येय वाक्य को आत्मसात करते हुए भारतीय वायु सेना ने देश की संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा में जो स्वर्णिम अध्याय लिखे हैं, वे हर भारतीय के हृदय में गर्व की अनुभूति कराते हैं।
इतिहास साक्षी है कि 1947-48 का कड़ाके की ठंड में हुआ लद्दाख अभियान हो, 1965 और 1971 के युद्धों में दुश्मन के दांत खट्टे करने वाले ऑपरेशन हों, या फिर कारगिल की दुर्गम चोटियों पर चलाया गया 'ऑपरेशन सफेद सागर' हमारे वायु योद्धाओं ने हर मोर्चे पर अपनी रणनीतिक श्रेष्ठता और सर्वोच्च बलिदान का परिचय दिया है। इसके अतिरिक्त, जब भी देश या विदेश में कोई प्राकृतिक आपदा आई है, चाहे वह उत्तराखंड की भीषण बाढ़ हो या कोविड महामारी के दौरान जीवनरक्षक दवाओं और ऑक्सीजन की आपूर्ति का संकट, वायु सेना ने 'ऑपरेशन राहत' जैसे अभियानों के जरिए हर विषम परिस्थिति में संकटमोचक की भूमिका निभाई है।
आज के आधुनिक दौर में, जब वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य और रणनीतिक चुनौतियां लगातार जटिल होती जा रही हैं, भारतीय वायु सेना का कायाकल्प भी बेहद तीव्र गति से हो रहा है। 'आत्मनिर्भर भारत' और स्वदेशीकरण के संकल्प के तहत राफेल, सुखोई-30 एमकेआई जैसे अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू विमानों के साथ-साथ स्वदेशी 'तेजस', 'प्रचंड' लाइट कॉम्बैट हेलीकॉप्टर और आधुनिक सी-17 ग्लोबमास्टर जैसे परिवहन विमानों ने हमारी युद्धक क्षमता को एक नई ऊंचाई दी है।
अत्याधुनिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों, उन्नत रडार नेटवर्क और ड्रोन तकनीक के समावेश ने हमारी वायु सीमा को अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान किया है। वायु सेना दिवस न केवल हमारे वायु वीरों के पराक्रम और बलिदान का स्मरण कराता है, बल्कि यह देश के प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास दिलाता है कि जब तक हमारे गगन प्रहरी नीले आसमान में मुस्तैद हैं, भारत की अखंडता और सुरक्षा पूरी तरह सुरक्षित है। संपूर्ण देश अपने जांबाज वायु योद्धाओं के शौर्य को सलाम करता है।