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युद्ध और कूटनीति के बीच फंसी दुनिया: क्या मानवता नई वैश्विक दिशा तलाश पाएगी

मोहित गौतम (दिल्ली) : आज की दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां हर दिशा में अनिश्चितता दिखाई देती है। एक ओर युद्ध हैं, हथियार हैं, सैन्य गठबंधन हैं और शक्ति प्रदर्शन की खुली प्रतिस्पर्धा है। दूसरी ओर कूटनीति है, संवाद है, समझौते हैं और शांति की कोशिशें हैं, लेकिन वे लगातार कमजोर होती जा रही हैं। यूक्रेन से लेकर मध्य पूर्व तक, एशिया से लेकर अफ्रीका तक, संघर्ष किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो दुनिया किसी स्थायी समाधान की तलाश में भटक रही हो, जहां युद्ध खत्म नहीं हो रहे और कूटनीति अपनी प्रभावशीलता खोती जा रही है।

बीसवीं सदी के बड़े युद्धों के बाद यह विश्वास बना था कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक समझौते भविष्य में बड़े टकरावों को रोकेंगे। लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में यह भरोसा लगातार टूटता दिख रहा है। आज युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जा रहे, बल्कि आर्थिक प्रतिबंधों, साइबर हमलों, सूचना युद्ध और कूटनीतिक दबावों के रूप में भी सामने आ रहे हैं। देश एक दूसरे पर सीधे हमला किए बिना भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस बदले हुए स्वरूप ने कूटनीति को और जटिल बना दिया है, क्योंकि अब दुश्मन स्पष्ट नहीं होता और मोर्चे अदृश्य हो चुके हैं।

वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। नई महाशक्तियां उभर रही हैं और पुरानी शक्तियां अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं। इस प्रतिस्पर्धा में छोटे देश अक्सर मोहरे बन जाते हैं। कहीं उन्हें सैन्य अड्डों का केंद्र बनाया जाता है, तो कहीं संसाधनों की राजनीति में घसीटा जाता है। कूटनीति का उद्देश्य संतुलन बनाना होता है, लेकिन वर्तमान माहौल में वह कई बार केवल औपचारिक बयानबाजी बनकर रह जाती है। शांति वार्ताएं होती हैं, लेकिन जमीन पर हालात जस के तस बने रहते हैं।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक नुकसान आम नागरिकों का हो रहा है। युद्ध केवल सैनिक नहीं मारते, वे समाज की रीढ़ तोड़ते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और खाद्य सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है। विस्थापन, शरणार्थी संकट और मानसिक आघात आज वैश्विक समस्या बन चुके हैं। कूटनीति का असली उद्देश्य इन्हीं मानवीय त्रासदियों को रोकना होना चाहिए, लेकिन अक्सर भू-राजनीतिक हित मानव जीवन से ऊपर रख दिए जाते हैं। यही कारण है कि दुनिया युद्ध और बातचीत के बीच लटकी हुई नजर आती है, लेकिन किसी ठोस समाधान तक नहीं पहुंच पा रही।

कूटनीति की कमजोरी का एक बड़ा कारण विश्वास की कमी है। आज देशों के बीच संवाद तो होता है, लेकिन भरोसा नहीं होता। हर समझौते के पीछे शंका छिपी रहती है। हर वार्ता रणनीति का हिस्सा बन जाती है। सोशल मीडिया और डिजिटल युग ने इस अविश्वास को और गहरा किया है, क्योंकि अफवाहें, आधी सच्चाइयां और प्रोपेगैंडा तेजी से फैलते हैं। इससे जनमत प्रभावित होता है और सरकारों पर कठोर रुख अपनाने का दबाव बढ़ता है। नतीजतन कूटनीति के लिए आवश्यक धैर्य और लचीलापन लगातार घटता जा रहा है।

भारत जैसे देशों के लिए यह दौर विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है। एक ओर वैश्विक मंच पर बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा है, दूसरी ओर संतुलन बनाए रखने की मजबूरी। युद्ध और कूटनीति के इस द्वंद्व में भारत की परंपरागत नीति संवाद, तटस्थता और बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित रही है। आज जब दुनिया खेमों में बंटने की ओर बढ़ रही है, तब ऐसे दृष्टिकोण की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल संतुलन की नीति पर्याप्त होगी, या आने वाले समय में भारत जैसे देशों को शांति के लिए अधिक सक्रिय भूमिका निभानी पड़ेगी।

दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि युद्ध हो रहे हैं, बल्कि यह है कि युद्ध सामान्य होते जा रहे हैं। जब संघर्ष रोजमर्रा की खबर बन जाते हैं, तब मानव संवेदनाएं सुन्न होने लगती हैं। यही वह क्षण होता है जब कूटनीति को सबसे मजबूत होना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्यवश वही सबसे कमजोर दिखाई देती है। शांति केवल समझौतों से नहीं आती, वह इच्छाशक्ति, नैतिक साहस और वैश्विक जिम्मेदारी से आती है। जब तक राष्ट्र अपने संकीर्ण हितों से ऊपर उठकर नहीं सोचेंगे, तब तक दुनिया इसी अधर में लटकी रहेगी।

अंततः सवाल यह नहीं है कि दुनिया युद्ध के रास्ते जाएगी या कूटनीति के, बल्कि यह है कि क्या वह मानवता को अपने निर्णयों के केंद्र में रखेगी या नहीं। तकनीक, हथियार और अर्थव्यवस्था के युग में यह भूलना आसान हो गया है कि हर संघर्ष के पीछे इंसानी जीवन हैं। यदि कूटनीति को केवल शक्ति संतुलन का औजार बना दिया गया, तो वह कभी स्थायी शांति नहीं ला पाएगी। दुनिया को अब ऐसी कूटनीति की आवश्यकता है जो डर से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से संचालित हो। तभी संभव है कि यह ग्रह युद्ध और संवाद के बीच फंसी स्थिति से बाहर निकल सके।

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