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केंद्र बनाम राज्य नहीं, केंद्र और राज्य क्यों ज़रूरी हैं: संघवाद की असली परीक्षा

मोहित गौतम (दिल्ली) : भारत का संविधान देश को “राज्यों का संघ” घोषित करता है। इसका सीधा अर्थ है कि यह देश न केवल केंद्र से चलता है और न ही केवल राज्यों से, बल्कि दोनों के संतुलन से चलता है। फिर भी पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक विमर्श लगातार “केंद्र बनाम राज्य” की दिशा में बढ़ता दिखाई देता है। नीतियों से लेकर संसाधनों तक, कानून से लेकर राजनीति तक, हर मुद्दा टकराव की भाषा में पेश किया जाने लगा है। यह प्रवृत्ति केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक सोच के लिए भी चिंता का विषय है।

केंद्र और राज्य का रिश्ता विरोध का नहीं, भूमिका का है। केंद्र की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, संचार और अखिल भारतीय ढांचे को संभालने की है। वहीं राज्य स्वास्थ्य, शिक्षा, कानून व्यवस्था, कृषि और स्थानीय प्रशासन की रीढ़ हैं। यदि केंद्र राष्ट्र की धड़कन है, तो राज्य उसकी सांसें हैं। दोनों में से किसी एक को कमजोर करना पूरे शरीर को कमजोर करना है।

समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक मतभेद संवैधानिक संतुलन पर भारी पड़ने लगते हैं। वित्तीय हिस्सेदारी, जांच एजेंसियों की भूमिका, कानूनों की व्याख्या और राज्यपालों की सक्रियता जैसे विषय अक्सर टकराव का रूप ले लेते हैं। इससे जनता के मन में यह धारणा बनती है कि केंद्र और राज्य एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं, जबकि वास्तव में वे एक ही व्यवस्था के पूरक स्तंभ हैं।

भारत जैसे विविध देश में राज्यों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भाषा, संस्कृति, भूगोल और सामाजिक संरचना हर राज्य में अलग है। स्थानीय समस्याओं का समाधान दिल्ली से बैठकर नहीं हो सकता। वहीं, वैश्विक दबावों, सीमाओं की सुरक्षा और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए एक मजबूत केंद्र अपरिहार्य है। यही कारण है कि संविधान निर्माताओं ने संघीय ढांचे को लचीला बनाया, ताकि परिस्थितियों के अनुसार केंद्र और राज्य दोनों अपनी भूमिका निभा सकें।

आज जब भारत विश्व मंच पर बड़ी भूमिका की ओर बढ़ रहा है, तब आंतरिक समन्वय और भी आवश्यक हो जाता है। यदि राज्यों को भरोसे में लिए बिना योजनाएं बनाई जाएंगी, तो उनका क्रियान्वयन कमजोर होगा। यदि केंद्र के दृष्टिकोण को नज़रअंदाज़ किया जाएगा, तो राष्ट्रीय नीति बिखर जाएगी। विकास, आंतरिक सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य जैसे विषय तभी प्रभावी हो सकते हैं जब दोनों स्तरों की सरकारें साझेदारी में काम करें।

सहयोगी संघवाद केवल एक नारा नहीं, बल्कि शासन की आवश्यकता है। जीएसटी जैसे ढांचे ने दिखाया कि जब केंद्र और राज्य संवाद से आगे बढ़ते हैं, तो बड़े सुधार संभव होते हैं। महामारी के दौर में भी यह स्पष्ट हुआ कि स्वास्थ्य राज्य का विषय होने के बावजूद राष्ट्रीय समन्वय के बिना संकट नहीं संभल सकता था। यह अनुभव बताता है कि टकराव राजनीतिक लाभ दे सकता है, लेकिन समाधान केवल सहयोग से ही निकलता है।

लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन उसे स्थायी संघर्ष का रूप देना खतरनाक है। जब केंद्र और राज्य लगातार एक दूसरे की नीयत पर सवाल उठाते हैं, तो सबसे अधिक नुकसान जनता का होता है। योजनाएं अटकती हैं, संसाधन राजनीति में उलझते हैं और शासन की विश्वसनीयता कमजोर होती है। यह स्थिति न तो मजबूत भारत के निर्माण में मदद करती है और न ही संघीय भावना को सुदृढ़ करती है।

आज जरूरत इस सोच को बदलने की है कि केंद्र और राज्य शक्ति की लड़ाई में हैं। असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अधिकार किसके पास ज्यादा हैं, बल्कि यह होना चाहिए कि जिम्मेदारी कैसे बेहतर निभाई जाए। संघवाद का उद्देश्य सत्ता का बंटवारा नहीं, बल्कि सेवा का विस्तार है। जब दोनों स्तर अपने दायित्वों को सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं, तभी लोकतंत्र जीवंत रहता है।

अंततः भारत की ताकत उसकी विविधता में है और उस विविधता का संवैधानिक रूप संघवाद है। यदि केंद्र और राज्य एक दूसरे को बाधा नहीं, बल्कि सहयोगी मानें, तो शासन अधिक प्रभावी होगा, लोकतंत्र अधिक मजबूत होगा और नागरिकों का भरोसा गहरा होगा। देश को “केंद्र बनाम राज्य” की राजनीति से बाहर निकालकर “केंद्र और राज्य” की साझेदारी की ओर ले जाना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

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