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क्या संयुक्त राष्ट्र सिर्फ बयानबाज़ी का मंच रह गया है?

मोहित गौतम (दिल्ली) : दुनिया आज युद्ध, मानवीय संकट और राजनीतिक अस्थिरता के ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां हर बड़े संकट पर एक नाम ज़रूर सुनाई देता है -संयुक्त राष्ट्र। लेकिन सवाल यह है कि क्या संयुक्त राष्ट्र अब केवल बयान जारी करने तक सीमित रह गया है, या वह सच में वैश्विक शांति का प्रहरी बना हुआ है?

यूक्रेन से लेकर गाज़ा तक, अफ्रीका से लेकर एशिया तक हर बड़े संघर्ष पर संयुक्त राष्ट्र की बैठकों, प्रस्तावों और अपीलों की लंबी सूची है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि युद्ध रुकते नहीं, नागरिक मरते रहते हैं और मानवीय कानूनों का खुलेआम उल्लंघन होता है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत मानी जाने वाली सुरक्षा परिषद आज उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुकी है। वीटो पावर रखने वाले देशों के हित टकराते हैं और नतीजा यह होता है कि किसी भी निर्णायक कार्रवाई पर सहमति नहीं बन पाती। शक्तिशाली देश अपने हितों की रक्षा में प्रस्तावों को रोक देते हैं, जबकि कमजोर देश केवल उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं।

मानवाधिकार परिषद, शांति मिशन और राहत एजेंसियां आज भी सक्रिय हैं, लेकिन उनके पास न तो पर्याप्त अधिकार हैं और न ही स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति। संयुक्त राष्ट्र अक्सर घटनाओं के बाद प्रतिक्रिया देता है, रोकथाम करने में विफल रहता है। यही कारण है कि उसे “reactive organization” कहा जाने लगा है, न कि समाधान देने वाली संस्था।

आज की दुनिया बहुध्रुवीय हो चुकी है। नई ताकतें उभर रही हैं, क्षेत्रीय गठबंधन मजबूत हो रहे हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र का ढांचा अभी भी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की मानसिकता में फंसा हुआ है। सुधारों की बात दशकों से हो रही है, लेकिन अमल लगभग शून्य है।

इसके बावजूद यह कहना भी सही नहीं होगा कि संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह अप्रासंगिक हो गया है। वह आज भी संवाद का सबसे बड़ा वैश्विक मंच है, जहां छोटे देश अपनी बात रख सकते हैं। लेकिन केवल मंच होना पर्याप्त नहीं है—दुनिया को अब फैसलों की जरूरत है, फाइलों की नहीं।

आज का असली सवाल यह नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र मौजूद है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह बदलती दुनिया के साथ खुद को बदलने के लिए तैयार है? यदि संयुक्त राष्ट्र निर्णायक शक्ति, निष्पक्षता और साहस नहीं दिखा पाया, तो इतिहास उसे एक ऐसी संस्था के रूप में याद करेगा जो सही समय पर सिर्फ बयान देती रही।

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