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हम इतने गुस्से में क्यों हैं? गुस्से में बदलता समाज और लोकतंत्र

मोहित गौतम (दिल्ली) : आज अगर किसी भी सार्वजनिक मंच, सोशल मीडिया या सड़क की बातचीत को सुना जाए, तो एक भावना सबसे ज्यादा दिखाई देती है - गुस्सा। लोग जल्दी भड़क जाते हैं, असहमति को दुश्मनी समझने लगे हैं और संवाद की जगह टकराव ने ले ली है। सवाल यह नहीं है कि लोग नाराज़ हैं, सवाल यह है कि हम इतने गुस्से में क्यों हैं।

गुस्से की पहली वजह असुरक्षा की भावना है। रोजगार, महंगाई, भविष्य और पहचान को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। जब लोगों को लगता है कि उनका कल सुरक्षित नहीं है, तो वे हर बात को खतरे के रूप में देखने लगते हैं। यह डर धीरे-धीरे गुस्से में बदल जाता है, क्योंकि डर का सबसे आसान रूप क्रोध होता है।

दूसरी बड़ी वजह संवाद का टूटना है। समाज में अब सुनने की आदत कम और बोलने की जल्दी ज्यादा हो गई है। सोशल मीडिया ने हर किसी को मंच तो दिया, लेकिन धैर्य नहीं सिखाया। अलग राय को चुनौती की बजाय अपमान समझा जाने लगा है। जब संवाद खत्म होता है, तब गुस्सा स्वाभाविक रूप से जगह बना लेता है।

राजनीति ने भी इस गुस्से को हवा दी है। भावनाओं पर आधारित बयान, पहचान की राजनीति और लगातार “हम बनाम वे” की भाषा ने समाज को खेमों में बांट दिया है। जब राजनीति समाधान नहीं, बल्कि उत्तेजना पैदा करे, तो समाज का संतुलन बिगड़ना तय है। धीरे-धीरे नागरिक नहीं, समर्थक बनते जाते हैं।

तकनीक ने गुस्से की गति बढ़ा दी है। पहले क्रोध सीमित दायरे में रहता था, अब वह कुछ सेकंड में हजारों लोगों तक पहुंच जाता है। एल्गोरिदम वही दिखाते हैं जो भावनाएं भड़काए। शांति, संतुलन और समझ की बातें वायरल नहीं होतीं, लेकिन गुस्सा तुरंत फैलता है।

एक और कारण है लगातार तुलना का दबाव। लोग खुद को दूसरों से लगातार तुलना कर रहे हैं - कमाई, जीवनशैली, सफलता और पहचान में। यह तुलना असंतोष को जन्म देती है। जब अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, तो निराशा गुस्से का रूप ले लेती है।

सबसे खतरनाक स्थिति तब बनती है जब गुस्सा सामान्य हो जाता है। जब अपशब्द, धमकी और नफरत रोज़मर्रा की भाषा बन जाए, तब समाज संवेदनशीलता खो देता है। गुस्सा तब विरोध का नहीं, पहचान का हिस्सा बन जाता है।

लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह गुस्सा पूरी तरह गलत है। कई बार गुस्सा अन्याय, असमानता और उपेक्षा के खिलाफ प्रतिक्रिया भी होता है। फर्क इस बात से पड़ता है कि गुस्सा समाधान की ओर ले जाता है या विनाश की ओर। आज समस्या यह है कि गुस्से को दिशा नहीं मिल रही, केवल उबाल मिल रहा है।

समाज को अब ठहरने की जरूरत है। सुनने, समझने और असहमत होने के सभ्य तरीकों को फिर से सीखने की जरूरत है। राजनीति को उत्तेजना नहीं, जिम्मेदारी दिखानी होगी। मीडिया को शोर नहीं, संदर्भ देना होगा। और नागरिकों को यह समझना होगा कि हर असहमति दुश्मनी नहीं होती।

अगर हम यह नहीं समझ पाए कि गुस्सा क्यों बढ़ रहा है, तो आने वाला समय और अधिक विभाजित होगा। सवाल सिर्फ यह नहीं कि हम गुस्से में क्यों हैं, असली सवाल यह है कि क्या हम इससे बाहर निकलना भी चाहते हैं।

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