क्या दुनिया फिर से दो गुटों में बंट रही है? (अमेरिका-यूरोप बनाम चीन-रूस की नई शक्ति राजनीति)
मोहित गौतम (दिल्ली) : दुनिया की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया फिर से दो बड़े गुटों में बंटने की ओर बढ़ रही है।
एक तरफ अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगी यूरोप के देश हैं, जो वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर चीन और रूस जैसे देश हैं, जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए शक्ति केंद्र के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे हैं। इन दोनों पक्षों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक राजनीति को पहले से अधिक जटिल बना दिया है।
शीत युद्ध के दौर में भी दुनिया दो गुटों में बंटी हुई थी। उस समय अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा ने कई दशकों तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया। हालांकि सोवियत संघ के विघटन के बाद ऐसा माना गया था कि दुनिया एक ध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, लेकिन आज के हालात फिर से बहुध्रुवीय शक्ति संतुलन की ओर इशारा कर रहे हैं।
आज की प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं है। आर्थिक प्रभाव, तकनीकी विकास, व्यापारिक नेटवर्क और कूटनीतिक गठबंधन भी इस प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। चीन का तेजी से बढ़ता आर्थिक प्रभाव और रूस की रणनीतिक भूमिका कई देशों के लिए नए समीकरण बना रही है।
दूसरी ओर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भी अपने सहयोग को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। सुरक्षा समझौते, सैन्य सहयोग और आर्थिक साझेदारी के माध्यम से वे अपनी स्थिति मजबूत रखने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि आज की दुनिया शीत युद्ध जैसी पूरी तरह विभाजित नहीं है। कई देश ऐसे हैं जो किसी एक गुट के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय संतुलन की नीति अपनाना चाहते हैं। भारत जैसे देश अपनी विदेश नीति में रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करते हैं ताकि वे वैश्विक राजनीति में स्वतंत्र भूमिका निभा सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति में प्रतिस्पर्धा और भी तेज हो सकती है। लेकिन यह प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य टकराव तक सीमित नहीं होगी, बल्कि तकनीक, व्यापार, ऊर्जा और कूटनीति के क्षेत्रों में भी दिखाई देगी।
ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दुनिया वास्तव में दो बड़े गुटों में बंटेगी या फिर बहुध्रुवीय व्यवस्था का नया मॉडल विकसित होगा। एक बात निश्चित है कि बदलती वैश्विक राजनीति आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को गहराई से प्रभावित करने वाली है।