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9 दिन में 5,121 फर्जी ऑर्डर और 42 लाख की ठगी, एक ही डिवाइस से चलता रहा ई-कॉमर्स फ्रॉड का खेल

मोहित गौतम (दिल्ली) : गुजरात के सूरत में साइबर क्राइम पुलिस ने ई-कॉमर्स कंपनी के साथ कथित तौर पर करीब 42 लाख रुपये की धोखाधड़ी करने वाले फर्जी COD ऑर्डर रैकेट का खुलासा किया है। जांच में सामने आया कि आरोपियों ने महज 9 दिनों के भीतर एक ही सेलर आईडी से 5,121 ऑर्डर जनरेट किए। शुरुआत में ये ऑर्डर अलग-अलग ग्राहकों की सामान्य ऑनलाइन खरीदारी जैसे दिखाई दे रहे थे, लेकिन डिजिटल जांच में इनके पीछे एक ही डिवाइस, एक ही IP एड्रेस, एक ही मोबाइल नंबर और एक ही कस्टमर आईडी का कनेक्शन सामने आया।

पुलिस के अनुसार, इस कथित फर्जीवाड़े में आरोपियों ने सूरत की ई-कॉमर्स कंपनी की Seller Protection Fund Policy का कथित तौर पर गलत फायदा उठाने की कोशिश की। इसके लिए बड़ी संख्या में फर्जी ऑर्डर तैयार किए गए और ज्यादातर ऑर्डर Cash on Delivery यानी COD के माध्यम से किए गए। पुलिस का कहना है कि इस पूरे खेल का उद्देश्य ऑर्डरों की संख्या बढ़ाकर कंपनी की भुगतान व्यवस्था का फायदा उठाना था।

जांच के मुताबिक, आरोपी ‘सुखविलास क्रिएशन’ नाम की सेलर आईडी का इस्तेमाल कर रहे थे। इस एक आईडी से सिर्फ नौ दिनों में 5,121 ऑर्डर किए गए। इतनी बड़ी संख्या में ऑर्डर सामने आने के बावजूद शुरुआत में यह मामला सामान्य ग्राहकों द्वारा की जा रही ऑनलाइन खरीदारी जैसा दिखाई देता रहा। बाद में कंपनी के सिस्टम में संदिग्ध गतिविधियों का पैटर्न सामने आया और संबंधित सेलर आईडी को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।

इसके बाद कंपनी ने मामले की शिकायत सूरत साइबर क्राइम पुलिस से की। पुलिस ने ऑर्डर से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड की जांच शुरू की तो अलग-अलग ग्राहकों के नाम पर दर्ज हजारों ऑर्डरों के पीछे एक समान डिजिटल कनेक्शन दिखाई दिया। जांच में कथित तौर पर पाया गया कि अलग-अलग ग्राहकों के नाम से बनाए गए ऑर्डरों में एक ही डिवाइस और एक ही IP एड्रेस का इस्तेमाल किया गया था। इसके अलावा एक ही मोबाइल नंबर और कस्टमर आईडी से जुड़े रिकॉर्ड भी जांच एजेंसियों के सामने आए।

पुलिस ने इसके बाद ऑर्डर डेटा के साथ IP एड्रेस, मोबाइल नंबर, ई-मेल आईडी और बैंकिंग लेनदेन की जानकारी को आपस में जोड़कर जांच आगे बढ़ाई। डिजिटल और वित्तीय रिकॉर्ड की कड़ियों को जोड़ने के दौरान अशरफ और उसके पार्टनर रक्षित समेत अन्य लोगों की कथित भूमिका सामने आने की बात कही गई है।

पुलिस के अनुसार, अशरफ और रक्षित पिछले करीब दो वर्षों से ई-कॉमर्स क्षेत्र से जुड़े हुए थे। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि फर्जी ऑर्डर तैयार करने का पूरा नेटवर्क किस तरह संचालित किया जाता था और इसमें कितने लोग शामिल थे।

जांच के दौरान रक्षित से जुड़े एक बैंक खाते में हुए लेनदेन ने भी पुलिस का ध्यान खींचा। पुलिस के मुताबिक, इस खाते से केवल 10 महीनों के दौरान करीब 2.46 करोड़ रुपये का लेनदेन हुआ। अब जांच अधिकारी इस रकम के स्रोत, उससे जुड़े लोगों और पैसे के इस्तेमाल की जानकारी जुटा रहे हैं।

पुलिस की जांच में भौतिक ठुम्मर का नाम भी सामने आया है। पुलिस के अनुसार, उसने कथित तौर पर फर्जी ऑर्डर तैयार करने में अशरफ की मदद की। वहीं आशीष वोरा की भूमिका को लेकर भी जांच की जा रही है। जांच एजेंसी के मुताबिक, आशीष Telegram के जरिए झारखंड के जामताड़ा से जुड़े कथित साइबर ठगी नेटवर्क के संपर्क में था।

पुलिस के अनुसार, आशीष को प्रत्येक ऑर्डर के लिए मिलने वाली करीब 120 रुपये की राशि में से लगभग 30 रुपये कमीशन के रूप में मिलते थे। अब जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि इस कथित नेटवर्क में जामताड़ा के अलावा दूसरे राज्यों के कितने लोग जुड़े हुए हैं और क्या इसी तरह अन्य सेलर आईडी का इस्तेमाल करके भी ई-कॉमर्स कंपनियों को नुकसान पहुंचाया गया।

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू हजारों ऑर्डरों का एक ही डिजिटल स्रोत से जुड़ना है। सामान्य तौर पर अलग-अलग ग्राहकों के ऑर्डर अलग-अलग मोबाइल नंबर, डिवाइस और इंटरनेट कनेक्शन से आते हैं। लेकिन जब बड़ी संख्या में ऑर्डरों में एक जैसे तकनीकी संकेत मिलने लगते हैं तो यह साइबर सुरक्षा और फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम के लिए बड़ा रेड फ्लैग माना जाता है।

ई-कॉमर्स कंपनियां फर्जी ऑर्डर, फर्जी रिटर्न और भुगतान से जुड़े जोखिमों को रोकने के लिए अलग-अलग सुरक्षा प्रणालियों का इस्तेमाल करती हैं। इस मामले में भी कंपनी द्वारा संदिग्ध गतिविधि पहचानने और संबंधित सेलर आईडी को ब्लैकलिस्ट करने के बाद पुलिस तक मामला पहुंचा। इसके बाद तकनीकी और वित्तीय जांच के जरिए कथित नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

पुलिस अब Telegram चैट, मोबाइल और अन्य डिजिटल डिवाइस, बैंकिंग ट्रांजेक्शन, IP एड्रेस और ऑर्डर से जुड़े रिकॉर्ड की जांच कर रही है। इन डिजिटल सबूतों के आधार पर यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि फर्जी ऑर्डर रैकेट का संचालन किस स्तर पर किया जा रहा था और इसके पीछे कितने लोगों की भूमिका थी।

जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या इस नेटवर्क ने केवल एक ई-कॉमर्स कंपनी को निशाना बनाया या दूसरी कंपनियों की Seller Protection Policy का भी कथित तौर पर दुरुपयोग किया गया। यदि अन्य सेलर आईडी या कंपनियों से भी इसी तरह के लेनदेन सामने आते हैं तो मामले का दायरा और बड़ा हो सकता है।

इस घटना ने ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए फर्जी COD ऑर्डरों और डिजिटल फ्रॉड की चुनौती को एक बार फिर सामने ला दिया है। ऑनलाइन कारोबार बढ़ने के साथ साइबर अपराधी भी भुगतान प्रणाली और सेलर सुरक्षा से जुड़ी कमियों का फायदा उठाने के नए तरीके खोज रहे हैं। ऐसे मामलों में तकनीकी निगरानी, संदिग्ध ऑर्डर पैटर्न की पहचान और वित्तीय लेनदेन की लगातार जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और आरोपियों से जुड़े डिजिटल तथा वित्तीय रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। जांच पूरी होने के बाद ही इस कथित नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों और इसकी वास्तविक गतिविधियों की पूरी तस्वीर सामने आ सकेगी। पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि अदालत में होने वाली कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होगी।

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