भारत में पानी का संकट 2030: क्या आने वाले वर्षों में जल युद्ध की आशंका
मोहित गौतम (दिल्ली) : भारत में पानी का संकट आने वाले वर्षों में एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती के रूप में उभर रहा है। वर्ष 2030 तक देश की बढ़ती जनसंख्या, तेजी से होते शहरीकरण और बदलते जलवायु पैटर्न के कारण जल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ने की आशंका है। कई रिपोर्टों और विशेषज्ञों की चेतावनियों के अनुसार भारत उन देशों में शामिल हो सकता है जहां पानी की मांग उपलब्ध संसाधनों से कहीं अधिक हो जाएगी।
देश के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। बड़े शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक, ट्यूबवेल और बोरवेल पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। बारिश के अनियमित होते पैटर्न और लंबे समय तक सूखे की स्थिति ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। 2030 तक यदि यही स्थिति बनी रही तो पीने के पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

कृषि क्षेत्र भारत की जल खपत का सबसे बड़ा हिस्सा है। परंपरागत सिंचाई पद्धतियों, जल की बर्बादी और जलवायु परिवर्तन के कारण खेती पर गहरा असर पड़ रहा है। कई राज्यों में किसान पहले ही पानी की कमी से जूझ रहे हैं। आने वाले वर्षों में यदि जल प्रबंधन में सुधार नहीं हुआ तो खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा सकता है।
शहरी क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है। महानगरों में बढ़ती आबादी और औद्योगिक गतिविधियों ने जल स्रोतों पर भारी दबाव डाला है। कई शहरों में टैंकरों के सहारे पानी की आपूर्ति हो रही है, जो अस्थायी समाधान है। 2030 तक यह संकट सामाजिक असंतोष का कारण भी बन सकता है।
पानी को लेकर राज्यों के बीच विवाद पहले से मौजूद हैं। नदियों के जल बंटवारे को लेकर कानूनी और राजनीतिक टकराव देखने को मिलते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल संकट और गहराया तो यह विवाद और अधिक गंभीर रूप ले सकते हैं। कुछ विश्लेषक इसे भविष्य के जल युद्ध की आशंका से भी जोड़कर देखते हैं, जहां संघर्ष हथियारों से नहीं बल्कि जल संसाधनों को लेकर होगा।
सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए कई योजनाएं और नीतियां लागू की हैं। जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नदियों की सफाई और जल उपयोग की दक्षता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि इन प्रयासों का प्रभाव तभी दिखेगा जब इन्हें जमीनी स्तर पर सख्ती से लागू किया जाए और आम नागरिक भी इसमें भागीदारी निभाएं।
2030 तक भारत के लिए पानी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा विषय बन सकता है। यदि समय रहते ठोस कदम उठाए गए, तो जल संकट को नियंत्रित किया जा सकता है। अन्यथा यह समस्या आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकती है।