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Trump Tariff Fear: भारत और चीन पर 100% टैरिफ का खतरा? रूसी तेल खरीद पर अमेरिकी प्रस्ताव से बढ़ी चिंता

मोहित गौतम (दिल्ली) : अमेरिका में रूस और ईरान से जुड़े एक नए प्रतिबंध प्रस्ताव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। प्रस्तावित कानून में रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की शक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति को देने की बात कही गई है। यदि यह प्रस्ताव कानून बनता है और इसके प्रावधान लागू किए जाते हैं, तो रूसी कच्चे तेल के प्रमुख खरीदारों में शामिल भारत और चीन पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सीनेट में रूस को आर्थिक रूप से कमजोर करने के उद्देश्य से एक व्यापक प्रतिबंध विधेयक पर मतदान की तैयारी की जा रही है। प्रस्ताव का मुख्य लक्ष्य रूस की ऊर्जा आय से मिलने वाले राजस्व को सीमित करना बताया गया है। रूस अपनी ऊर्जा बिक्री से मिलने वाली आय का उपयोग अर्थव्यवस्था और सरकारी गतिविधियों के लिए करता है। इसलिए अमेरिका रूस के तेल और गैस व्यापार पर अधिक दबाव बनाने की दिशा में नए विकल्प तलाश रहा है।

प्रस्तावित विधेयक के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया जा सकता है, जो बड़ी मात्रा में रूसी तेल या गैस खरीदना जारी रखते हैं। हालांकि यह समझना जरूरी है कि यह फिलहाल एक प्रस्तावित कानूनी व्यवस्था है। इसके कानून बनने, लागू होने और किसी देश पर वास्तविक टैरिफ लगाए जाने की प्रक्रिया अलग होगी। इसलिए भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगना अभी तय नहीं माना जा सकता।

भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। वर्ष 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़े बदलाव आए। इसके बाद भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई और रूसी तेल देश के प्रमुख आयात स्रोतों में शामिल हो गया।

रियायती कीमतों पर मिलने वाले रूसी कच्चे तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को लागत प्रबंधन में मदद की। इससे घरेलू ईंधन आपूर्ति को बनाए रखने और वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव के प्रभाव को कम करने में भी सहायता मिली। भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं, इसलिए सरकार के लिए स्थिर और किफायती तेल आपूर्ति एक महत्वपूर्ण आर्थिक प्राथमिकता है।

यदि भविष्य में अमेरिका रूसी तेल खरीद से जुड़े देशों पर भारी टैरिफ लागू करता है, तो भारत के सामने कई आर्थिक और व्यापारिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की कीमत बढ़ सकती है, जिससे कुछ क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की आशंका हो सकती है। हालांकि किसी संभावित प्रभाव का वास्तविक स्तर टैरिफ की दर, प्रभावित उत्पादों और लागू किए जाने वाले नियमों पर निर्भर करेगा।

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध लगातार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। दोनों देश व्यापार, तकनीक, रक्षा, ऊर्जा और निवेश के कई क्षेत्रों में सहयोग कर रहे हैं। ऐसे में रूसी तेल से जुड़ा कोई नया अमेरिकी कदम दोनों देशों के व्यापारिक संवाद को भी प्रभावित कर सकता है। भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों और अमेरिका के साथ आर्थिक संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ सकता है।

चीन भी रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। इसलिए प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ व्यवस्था का असर चीन पर भी पड़ सकता है। भारत और चीन दोनों की ऊर्जा जरूरतें बड़ी हैं और दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक व्यापार से गहराई से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में किसी बड़े टैरिफ फैसले का प्रभाव केवल दो देशों तक सीमित नहीं रह सकता।

अमेरिका में इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक बहस भी जारी है। कुछ सांसद रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए कठोर कदमों का समर्थन कर रहे हैं। दूसरी ओर, आलोचकों का मानना है कि राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार देने से अमेरिकी सहयोगियों और व्यापारिक साझेदारों पर भी असर पड़ सकता है। इससे अमेरिका में आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ने और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

प्रस्तावित कानून का उद्देश्य रूस के साथ-साथ ईरान से जुड़े कुछ आर्थिक और रणनीतिक मुद्दों पर भी अमेरिकी कार्रवाई को मजबूत करना बताया गया है। अमेरिका लंबे समय से रूस पर यूक्रेन युद्ध को लेकर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। वहीं ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी अमेरिका की चिंताएं बनी हुई हैं।

भारत की ओर से अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित अमेरिकी कानून पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया दी जाएगी या नहीं। भारत पहले भी यह कहता रहा है कि उसकी ऊर्जा नीति देश की जरूरतों, आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर तय की जाती है। ऐसे में भविष्य में कोई नया अमेरिकी टैरिफ लागू होने की स्थिति में भारत अपने व्यापारिक और ऊर्जा हितों का आकलन कर सकता है।

फिलहाल भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगने की कोई अंतिम घोषणा नहीं हुई है। यह आशंका एक प्रस्तावित अमेरिकी विधेयक और उसमें शामिल संभावित अधिकारों से जुड़ी है। कानून बनने और उसके लागू होने से पहले कई विधायी तथा प्रशासनिक चरण पूरे होने होंगे। इसलिए इस मामले को संभावित नीति जोखिम के रूप में देखना अधिक उचित होगा, न कि पहले से तय आर्थिक निर्णय के रूप में।

आने वाले दिनों में अमेरिकी सीनेट में इस प्रस्ताव पर होने वाली प्रक्रिया, राष्ट्रपति प्रशासन का रुख और भारत तथा चीन की संभावित प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। यदि प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो वैश्विक ऊर्जा व्यापार, भारत अमेरिका आर्थिक संबंध और रूस से तेल खरीदने वाले देशों की रणनीति पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

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